किसी जमाने में चंबल के बीच बीहड़ों में होने के बाबजूद भी इटावा जिले की पहचान हेता था एक गांव। आज उसी गांव से रूबरू करवाते है इस गांव दशा और दिशा तब क्या थी और आज क्या है। आईये जानते प्रसि़द्ध समाजसेवी अरुणेश सिंह भदौरिया कि कलम से।
एक गाँव जिसका नाम है बरौली खुर्द जो जिला इटावा उत्तर प्रदेश चंबल नदी के पास बसा हुआ है। गाँव में पहुँचने के बाद स्वतः ही पता चल जाता था कि हम गाँव में पहुँच गये। कारण गाँव की आवो हवा के मुताबिक गांव के चारों तरफ जंगल ही जंगल नजर आता है लेकिन इसके बाद भी गाँव में मंगल था,शांति थी कहीं कोई भी डर भय नाम की चीज नहीं थी।
मैं समाजसेवी तथा जनशक्ति वेलफेयर सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरुणेश सिंह भदौरिया स्वयं इसी गाँव से ताल्लुक रखता हूँ। वर्ष 1982 में गाँव से अपने पिता के साथ शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से बाहर निकल गये। जिसकी बजह से गाँव में आना-जाना कम रहा लेकिन बडे आश्चर्य की बात है उसके बाद से गांव में मानों पलायन की बाढ़ सी आ गायी। गाँव में कभी हजारों वोटर हुआ करते थे अब मात्र 200 वोटरों के अंदर सिमिट कर रह गया।
यह गांव आबादी कम हो जाने के कारण मौजूदा स्थिति में राजैनतिक लाभ से भी वंचित है गांव का प्रधान भी दो गांव (करीलगढ़ एवं बरौली) की वोटिंग से चुना जाता है इसलिए प्रधान की भी इस गाँव के विकास को लेकर कोई रूचि नहीं रहती है । विधायक ी का भी कोई लेना देना नहीं है। बाहर रहने वाले इस गांव के वासिंदों का भूले भटके गांव आने का सिर्फ एक मात्र कारण है मसान बाबा की पूजा । जिसे करने के लिए गांव के वासिंदों को मजबूरन आना ही पड़ता है। बाबा मसान की ऐसी मान्यता है कि पूजा करने के लिए स्थान पर यदि नहीं आये तो बाबा के प्रकोप से परिवार में खुशहाली को संतुलन बिगडने का डर लगा रहता है या यूँ भी कहे कि समय पर्यंत पूजा करते रहने से परिवार में सदैव खुशियां भरपूर रहती है। यही एक कारण है कि गांव अभी तक पूरी तरह से खाली नहीं हुआ वरना कब का बीरान हो जाता ।
जनशक्ति वेलफेयर सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते मैं उत्तर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ जी से केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि आप अपनी टीम भेजकर इस गांव का मुआयना करवायें और पता लगाएं कि गांव के उत्थान में आखिर कमी क्यों आ रही है कोई भी पार्टी इस गांव कि ओर क्यों ध्यान नहीं दे रही है। सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जब गांव में लोगो से गांव की बदहाली का कारण पूंछा तो केवल एक बात समझ में आयी कि गांव काफी अंदर जंगल में होने के कारण पार्टियों को अपनी और आकर्षित नहीं कर पा रहा है इसके अलावा वोटिंग प्रतिशत कम होने के कारण भी नेतागण ध्यान नहीं देते है।
गांव की वर्तमान समस्या जो जान भी ले सकती है वह है गन्दा पीने का पानी। यह पानी सीधे बोरवेल से निकल रहा है । गांव के लोगों को मजबूरन इस पानी को पीना पड रहा है कारण और कोई विकल्प भी नहीं है।
गांव में इंफ्रास्ट्रक्चर नाम कि कोई भी चीज नहीं है इस गांव में जैसे रोड,नाली,प्रॉपर सीवेज, स्कूल बिल्डिंग, सार्वजानिक कम्युनिटी हाल ( चौपाल) जैसी कोई व्यवस्था नहीं हैं । पूजा करने के स्थान पर पानी न होने कि वजह से लोगो को अपने अपने घरो से पानी ले जाना पड़ता है जो कि एक बहुत बड़ी समस्या है। इस समस्या को हल करने के लिए जनशक्ति वेलफेयर सोसाइटी ने पानी का बोरवेल करवाने कि जिम्मेदारी ली है यह कार्य मार्च 2025 से पहले हो जायेगा ऐसा अश्वासन सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष समसजेवी अरुणेश सिंह भदौरिया जी ने दिया है।
एक गांव की कहानी (प्रस्तुति: समाजसेवी अरूणेश सिंह भदौरिया)
