भोपाल। मोहन सरकार ने पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार के एक और फैसले को पलट दिया. अब नगर पालिका और नगर परिषदों के अध्यक्ष को सीधे जनता चुनेगी. इसके लिए चर्चा के बाद मध्य प्रदेश नगर पालिका संशोधन विधेयक-2025 को विधानसभा में पास कर दिया गया. संशोधन विधेयक में मतदाताओं को निर्वाचित अध्यक्ष को वापस बुलाने का अधिकार दिया गया है. अध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान एक बार ही अध्यक्ष को वापस बुलाए जाने की प्रक्रिया की जा सकेगी.
अब सीधे चुने जाएंगे नगर निकायों के अध्यक्ष
मध्य प्रदेश में नगर पालिका-परिषद अध्यक्षों के चुनाव डायरेक्ट होंगे. विधानसभा में नगर पालिका संशोधन विधेयक 2025 पारित हो गया. अब प्रदेश के सभी नगर पालिका और नगर परिषद में अध्यक्ष को चुनाव लड़ना होगा. अभी तक पार्षद ही अपने बीच में से अध्यक्ष को चुनते आए हैं. संशोधन विधेयक में प्रावधान किया गया है कि कोई भी व्यक्ति अध्यक्ष और पार्षद पद के लिए निर्वाचित हो सकेगा, लेकिन निर्वाचित घोषित किए जाने की तारीख से 7 दिन के अंदर किसी एक पद से अपना इस्तीफा देना होगा.
कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह के फैसलों को पलट दिया था
साल 1994 में महापौर और अध्यक्ष को अप्रत्यक्ष प्रणाली से पार्षद चुनते थे, लेकिन साल 1997 में दिग्विजय सरकार ने प्रत्यक्ष प्रणाली लागू की. इसके बाद साल 1999 से 2014 तक सीधे जनता ने महापौर और अध्यक्ष को चुना, लेकिन साल 2019 में कमलनाथ सरकार ने फिर अप्रत्यक्ष प्रणाली लागू कर दी. इससे एक बार फिर पार्षदों को अध्यक्ष चुनने का अधिकार मिल गया. 2022 में बीजेपी सरकार के दौरान पार्षदों ने ही अध्यक्ष चुने थे. मेयर को जरूर सीधे जनता ने चुना था. अब मोहन सरकार में 2027 के चुनाव में जनता सीधे अध्यक्ष को चुनेगी।
वापस बुला सकेंगे अध्यक्ष, एक बार मिलेगा मौका
नगर पालिका संशोधन विधेयक में चुने हुए अध्यक्ष को वापस बुलाने का अधिकार भी मतदाताओं को दिए जाने का प्रावधान किया गया है. विधेयक में प्रावधान किया गया है कि नगर पालिका क्षेत्र के आधे से ज्यादा मतदाता द्वारा वोट किए जाने पर अध्यक्ष को हटाया जाएगा. हालांकि यह प्रक्रिया तब शुरू होगी जब निर्वाचित 3 चौथाई पार्षद कलेक्टर को प्रस्ताव सौंप दें. मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि पहले ढाई साल राइट टू रिकॉल के लिए तय था. अब इसे 3 साल कर दिया गया है. जनता अब जनप्रतिनिधि को 3 साल बाद ही वापस कर सकेगी।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधेयक में सुधार की मांग की
सरकार के इस फैसले पर सियासत भी शुरू हो गई है. नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि ष्विरोध नहीं किया है, विधेयक में सुधार के लिए कहा है. डेमोक्रेसी की मजबूती के लिए राइट टू रिकॉल का समय 5 साल की बजाय 3 साल का तय किया गया है.उन्होंने कहा कि ष्ये बीजेपी का केवल चुनावी हथियार है. इस बिल के राजनीतिक लाभ ज्यादा हैं. इस बिल से क्या पीने का पानी, सड़क, बिजली मिल जाएगी. इस बिल के बाद छोटे तबके के व्यक्ति को मौका नहीं मिल पायेगा।
मोहन यादव ने पलट दिया कमलनाथ का फैसला, अब सीधे जनता चुनेगी नगर पालिका और नगर निगम अध्यक्ष
