उज्जैन में यूजीसी की नई गाइडलाइन का विरोध प्रदर्शन, बोले नहीं हुआ सुधार तो छात्र हित में मैदान में उतरेंगे

उज्जैन। यूजीसी की नई गाइडलाइन को लेकर देश भर में विरोध हो रहा है. सवर्ण समाज के साथ-साथ अब अखाड़ों के संत-महंत ने भी अपनी आवाज बुलंद कर दी है. वहीं, दूसरी ओर शहर की सड़कों पर यूजीसी की नई गाइडलाइन को लेकर बड़ी संख्या में सवर्ण समाज उतरा और जमकर विरोध प्रदर्शन कर नारेबाजी की. सवर्ण समाज ने इस मामले को लेकर सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलगुरु और जिला प्रशासन को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भी सौंपा है.
सवर्ण समाज ने 2 घंटे तक किया प्रदर्शन
यूजीसी की नई गाइडलाइन को लेकर शहर के टावर चौक से शहीद पार्क तक सवर्ण समाज ने बुधवार देर शाम बड़ी संख्या में एकत्रित होकर 2 घंटे तक विरोध प्रदर्शन किया. यूजीसी संशोधन बिल को काला कानून बताते हुए रद्द करने की मांग की है. सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलगुरु शैलेंद्र कुमार शर्मा और जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा. इस प्रदर्शन में साधु संत भी शामिल हुए।
विद्यार्थियों में विद्वेष भरने का आरोप
इस मामले को लेकर पंचदशनाम जूना अखाड़ा के संत महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरी महाराज ने कहा, ष्शिक्षा जीवन में प्रतिभा और तप आधारित होती है, जो हर भेद से ऊंची है. देश ने 77वां गणतंत्र मनाया और अब हम विद्यार्थी काल से ही जातिगत विद्वेष भर रहे हैं, ये उचित नहीं है. सरकार इस मामले में गंभीरता से विचार कर निर्णय में बदलाव करें. संत शैलेशानंद ने कहा, कि ष्हमें मास्टर ऑफ रिफॉर्म्स की जरूरत है।
संशोधन नहीं हुआ, तो उचित नहीं होंगे परिणाम
बड़ा उदासीन अखाड़ा के महंत सत्यानंद ने कहा कि ष्विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की जो नई गाइडलाइन है, ये वास्तव में दुखद है. जातिगत भेद भाव से छात्रों को दूर रखना चाहिए. छात्रों के मित्र, शिक्षक जाती देख कर तय नहीं होते. इसके विरुद्ध अगर आवाज उठ रही है, तो इसमें कुछ गलत नहीं है. साधु संतों ने सामाजिक समरसता बनाये रखने के लिए काम किया है. छात्र हित में जो भी आवश्यक कदम उठाने पड़ेंगे, संत समाज उठाएगा. संशोधन नहीं हुआ तो आने वाले समय में इसके परिणाम उचित नहीं होंगें।
क्या है यूजीसी की नई गाइडलाइन!
यूजीसी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने बीते 13 जनवरी 2026 से उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने का नियम 2026 लागू किया. मकसद बताया गया कि उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकना और सभी छात्रों को बराबरी के अवसर देना है. जिसके तहत एससी, एसटी के साथ ओबीसी को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है.
झूठे आरोपों में फंसाए जाने का है डर
इसके लिए हर संस्थानों में समानता समिति बनाने का प्रावधान है, जिसमें ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधि होंगे. समिति हर 6 महीने में रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगी. इसमें सामान्य वर्ग का प्रतिनिधि नहीं होने से बवाल मचा हुआ है. सवर्ण समाज मानता है कि इसका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है और छात्रों या शिक्षकों को झूठे आरोपों में फंसाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने नई गाइडलाइन पर लगाई रोक
यूजीसी की इस नई गाइडलाइन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. जिस पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई और नई गाइडलाइन पर अंतरिम रोक लगा दी गई. कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे से जुड़े कुछ संवैधानिक और कानूनी सवालों की जांच की जानी बाकी है. नियमों में अस्पष्टता है और उनका दुरुपयोग हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

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