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रमौआ जलाशय में मत्स्य पालन से वंशानुगत मछुआ परिवारों की बदली तकदीर - Nand Kesari || Top News || Latest News

रमौआ जलाशय में मत्स्य पालन से वंशानुगत मछुआ परिवारों की बदली तकदीर

(हितेन्द्र सिंह भदौरिया)
ग्वालियर। कभी हाथठेला लगाकर गली-गली फल और सब्जी बेचकर परिवार का भरण-पोषण करने वाले ग्राम रमौआ के श्री अर्जुन बाथम आज सफल मत्स्य उद्यमी के रूप में पहचान बना चुके हैं। वे “रतनगढ़ वाली माता मछुआ सहकारी समिति” रमौआ के अध्यक्ष हैं। अर्जुन एवं उनके साथी इस समिति के माध्यम से मत्स्य पालन कर प्रतिवर्ष लगभग 9 से 10 लाख रुपए का शुद्ध लाभ अर्जित कर रहे हैं। यह सुखद सफलता सरकार के मत्स्योद्योग विभाग की दूरदर्शी कार्ययोजना और स्थानीय वंशानुगत मछुआरा परिवारों के सामूहिक प्रयासों से मिली है।
शहर के समीप स्थित रमौआ सिंचाई जलाशय के आसपास वर्षों से मछुआरा परिवार निवास करते आए हैं। मछली पकड़ना उनकी पुश्तैनी आजीविका रही है। जलाशय का व्यवस्थित पट्टा उपलब्ध नहीं होने के कारण वे अपने पारंपरिक व्यवसाय से अपेक्षित लाभ नहीं ले पा रहे थे। मत्स्योद्योग विभाग उनकी मदद के लिए आगे आया। विभाग ने स्थानीय एवं आसपास के वंशानुगत मछुआरा परिवारों को एकजुट कर ष्रतनगढ़ वाली माता मछुआ सहकारी समिति मर्यादित, रमौआष् का गठन कराया। समिति का विधिवत पंजीयन भी करा दिया। इसके बाद समिति को रमौआ सिंचाई जलाशय का 10 वर्षीय मत्स्य पालन पट्टा मिल गया, जिससे जलाशय का लाभ वास्तविक हितग्राहियों को मिलने लगा। वर्तमान में समिति द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 30 से 35 टन मछली उत्पादन किया जा रहा है। इससे समिति से जुड़े मत्स्य पालकों को 9 से 10 लाख रुपए वार्षिक शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। समिति के सदस्यों की आय बढने से उनके परिवारों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है। समिति के लोगों को स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार उपलब्ध हुआ है। साथ ही रमौआ एवं आसपास के गांवों एवं ग्वालियर शहर के लोगों को उचित मूल्य पर ताजी मछली भी आसानी से उपलब्ध हो रही है।
दस वर्ष की पट्टा अवधि ने समिति के सदस्यों को दीर्घकालीन आजीविका का भरोसा दिया है। अब वे आत्मविश्वास के साथ मत्स्य उत्पादन बढ़ाने, आधुनिक तकनीकों को अपनाने और अपने व्यवसाय का विस्तार करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। यह पहल केवल आर्थिक उन्नति का माध्यम नहीं बनी, बल्कि स्थानीय मछुआरा समुदाय के सामाजिक सशक्तिकरण का भी प्रभावी उदाहरण बनकर सामने आई है। रमौआ की इस सफलता से प्रेरित होकर जिला ग्वालियर के विभिन्न ग्रामीण तालाबों एवं सिंचाई जलाशयों का भी 10 वर्षीय मत्स्य पालन पट्टा स्थानीय मछुआ सहकारी समितियों को आवंटित किया जा रहा है। इससे जिले के अनेक वंशानुगत मछुआरा परिवारों को स्थायी रोजगार, सम्मानजनक आय और आत्मनिर्भरता का नया अवसर मिला है। “रतनगढ़ वाली माता मछुआ सहकारी समिति” रमौआ से जुड़े मत्स्य पालक कहते हैं यदि सरकारी योजना का लाभ सही पात्र हितग्राही सुनियोजित ढंग से उठाएं तो पारंपरिक आजीविका भी समृद्धि का मजबूत माध्यम बन सकती है। वे अपनी सफलता पर राज्य सरकार के प्रति धन्यवाद व्यक्त करते हुए नहीं थकते।

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