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एमपी: सपने में दिखी जगह पर 17 फुट खुदाई कराई,निकली सती माता की अमूर्त प्रतिमा - Nand Kesari || Top News || Latest News

एमपी: सपने में दिखी जगह पर 17 फुट खुदाई कराई,निकली सती माता की अमूर्त प्रतिमा

उज्जैन। मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित मकला गांव में आस्था और लोकभावना का अद्भुत दृश्य देखने को मिला. गांव में एक प्राचीन बावड़ी के समीप से 17 फुट गहरी खुदाई करने पर अति प्राचीन सती माता की प्रतिमा मिली है. ग्रामीणों के अनुसार सिमरोल गांव की रहने वाली महिला लाडकुंवर के सपने में ये प्रतिमा आई थी. उसी आधार पर गांव मकला में बताए स्थान पर 17 फुट खुदाई करवाकर प्रतिमा निकलवाई गई।
17 फुट पर खुदाई में अमूर्त रूप में शिलालेख की तरह प्राप्त हुई प्रतिमा
खुदाई के दौरान पूरा गांव मौके पर मौजूद रहा. ग्रामीणों ने प्रतिमा को गांव के ही मंदिर में स्थापित करने की बात कही है. पुराविद प्रोफेसर डॉ. रमण सोलंकी ने पुष्टि करते हुए कहा कि लगभग 800 से 1000 वर्ष पूर्व इस तरह की प्रतिमाएं स्थापित की जाती रही हैं. समय के अभाव में विप्लुत होती प्रतिमाएं लोक भावना के माध्यम से सामने आती हैं.
गुजर्र समाज के चाड गौत्र की कुलदेवी हैं सती माता
गांव के सरपंच नीलेश गुर्जर ने कहा, हमारा गांव मकला खाचरौद तहसील में आता है जो उज्जैन जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर दूर है. गांव में सिमरोल गांव के रतनसिंह का आना हुआ. उन्होंने बताया कि उनके गांव के रहने वाले विक्रम सिंह की पत्नी लाड़कुंवर को भाव आए थे. सपने में उन्हें गांव मकला में पटेल की बावड़ी के पास सती माता की प्रतिमा का अनुभव हुआ जो गुजर्र समाज के चाड गौत्र की कुलदेवी हैं।
उन्होंने आगे कहा, चूंकि विक्रम सिंह को देवनारायण भगवान और उनकी पत्नी को सतीमाता का ईस्ट है. रतन सिंह की बात मानते हुए लाड़कुंवर के बताए स्थान अनुसार मकला गांव में पटेल की बॉवडी के पास तेरस के दिन मुहूर्त अनुसार जेसीबी से खुदाई शुरू कराई गई. करीब 17 फुट पर खुदाई में प्रतिमा अमूर्त रूप में शिलालेख की तरह प्राप्त हुई. मूर्ति को हम गांव मकला के कालाजी भैरव मंदिर में स्थापित कर मंदिर को भव्य रूप देंगे.
अमूर्त में भी मूर्त रूप देख कर पत्थर की पूजा की जाती है
पुराविद डॉ रमण सोलंकी ने कहा, सामने दिख रहा प्रस्तर, अति प्राचीन और अमूर्त है. मूर्त तो शिल्पी ही देगा. लंबे वक्त तक मिट्टी के अंदर दबे रहना उसका क्षरण होना स्वाभाविक है. लोककथाओं के आधार पर जिस प्रकार ग्रामीण क्षेत्र में चर्चा है प्रतिमा को लेकर वास्तविकता यही है. अमूर्त में भी मूर्त रूप देख कर पत्थर की पूजा की जाती है. आज से 1000 साल पहले युद्धों का चलन था. मालवा की बात हो या राजस्थान की जिसकी सीमा में सती की प्रतिमा निकली है. 16-17वीं शताब्दी तक निरंतर युद्ध चलते रहे. युद्धों के कारण यहां अनेक वीर आहत हुए और महिलाएं सती हुईं।
पुराविद ने कहा, वे वीर जिनकी पत्नियां सती हुईं. उनकी मूर्तियां बिठाए जाने की रही है परंपरा
पुराविद प्रो डॉ. रमण सोलंकी ने कहा, वे वीर जिनकी पत्नियां सती हुईं. उनकी गातीये(मूर्तियां) बिठाए जाने की परंपरा थी. तात्कालिक परिस्थितियों में या तो पत्थर को तराशा जाता था, या फिर पत्थर पर महिला, पुरुष, हाथी, घोड़े, चंद्र और सूर्य बनाये जाते थे. मांगलिक चिह्न बनाये जाते थे जो सती पिलर की विशेषता होती है. लेकिन कई बार जल्दबाजी में या परिवारिक परंपरानुसार सिर्फ प्रस्तर(पत्थर) बैठा दिया जाता था और उसी पर माता पूजन शुरू कर दिया जाता था. ऐसे ही सती माता, पुलिया बाबाजी की व पूर्वजों के स्थान पर गातीये बैठाने की परंपरा रही है. शिलालेख देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि 800 से 1000 वर्ष पूर्व सती माता का गातीये बैठाया हो.
मकला गांव का भी महत्व…
मकला गांव में कालाजी का मंदिर व बावड़ी ये प्रमाण देती है कि यह बावड़ी परमार कालीन है. उस वक्त कालाजी की बावड़ी जलस्रोत के लिए बनाई जाती थीं, शिव, विष्णु व लोकदेवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की जाती थीं. इस प्रकार के प्रस्तर पर प्रतिमाएं मिलती हैं।

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