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अखिल भारतीय साहित्य परिषद सिटी सेंटर क्षेत्र की काव्य गोष्ठी में बही सुर धारा - Nand Kesari || Top News || Latest News

अखिल भारतीय साहित्य परिषद सिटी सेंटर क्षेत्र की काव्य गोष्ठी में बही सुर धारा

ग्वालियर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद की सिटी सेंटर ग्वालियर की काव्य गोष्ठी अनिल पाण्डेय सह संघ चालक रा स्व संघ ग्वालियर जिला की अध्यक्षता एवं जगदीश गुप्त “महामना “के मुख्य आतिथ्य में शिशुमंदिर परिसर सरस्वती नगर में सम्पन्न हुई। आज आयोजित संघ शताब्दी वर्ष गतिविधि विस्तार योजना के कार्यक्रम में संयोजक प्रख्यात अखिल भारतीय गीतकार राजेश शर्मा ने बताया कि राष्ट्रीय विचार के समस्त साहित्यकारों से नियमित मिलन से राष्ट्रवादी साहित्य चेतना को शक्तिशाली बनाना है। इस आशय को लेकर गतिविधि प्रारम्भ की गई है। इससे पूर्व अतिथियों द्वारा विधि विधान से सरस्वती पूजन किया गया। तदुपरांत दिनेश विकल द्वारा सरस्वती वंदना प्रस्तुत की गई। इसके बाद साहित्य परिषद का ध्येय गीत अखिलेश श्रीवास्तव ने प्रस्तुत किया।
तत्पश्चात् महफिल का आगज करते हुये प्रख्यात गीतकार राजेश शर्मा ने कुछ यूं गुन गुनाया वानगी देखें-
हिमगिरि को गलने की पीड़ा,
नदियों को चलने की पीड़ा,
खारापन भी दे जाता है,
सागर में मिलने की पीड़ा,
सागर की पीड़ा कहती है,
ये विस्तार कहाँ ले जाए।

इसके बाद जगदीश महामना ने संदेश परक रचना को कुछ इस प्रकार से गुन गुनाया वानगी देखें-
रामराज स्थापना,अब यही राष्ट्र आराधना,
एक दूजे से विनय करें,हम करें यही बस प्रार्थना।

ललित मोहन त्रिवेदी ने अपनी रचना में भारत के दुश्मनों पर निशाना साधते हुआ गीत पढ़ा कि
टूट पाएंगें नहीं पत्थर जरा सी चोट से,
ये उड़ाने ही पड़ेंगें भूमिगत विस्फोट से।

वहीं क्रमिक रूप से श्रीमती उमा उपाध्याय की रचना की वानगी देखें
आज मैं करती हूँ वादा हार न मानूँगीं मैं,
टूटे तारों के बसंती स्वर से भी गाऊँगीं मैं ।

अपनी बारी का इंतजार कर रहे दिनेश विकल भी पीछे नहीं रहे उन्होंने देश प्रेम की बौछार कर दी वानगी देखें
फौज डटी है सीमा पर,जनता भीतर हुंकारी हैं,
आजादी को कायम रखना सबकी जिम्मेदारी हैं,

वहीं डॉ विजय करुण की रचना को भी खूब सराहना मिली वानगी देखें
मैं कभी न आता इस संसार में यार,
मुझको खींच लाया यहाँ ,यहाँ का प्यार।

इसी क्रम में जगमोहन श्रीवास्तव ने गुरुओं के योगदान पर मनभावन रचना पढ़ी वानगी देखें-
थापड़, झापड़ संटी मुर्गा,रोज उमेठे कान गुरु,
तब तो जालिम से लगते थे,अब लगते भगवान गुरू।

बहुत देर से खामोश बैठे डॉ रवीन्द्रनाथ मिश्र ने अपनी रचना को कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया वानगी देखें
कुछ मुट्ठी सपने लिए नयन कर लिए बंद,
मन पागल गाने लगा प्रेम भरे कुछ छंद।

सुरेन्द्रपाल सिंह कुशवाह के बरसाती गीत को खूब सराहनी मिली वानगी देखें
ऐ वारिश की बूंदों की जा सको तो उस घर जाना।
सपनीली मस्त बयार हो सके वो सावन लाना।

सभा के अंत में अनिल पाण्डेय ने अध्यक्षीय उद्वोधन दिया। अपने उद्बोधन में उन्होंने संघ एवं साहित्य परिषद के बारे में प्रकाश डाला। कार्यक्रम का कुशल संचालन सुरेन्द्रपाल सिंह कुशवाहा एवं आभार राजेश शर्मा ने किया। गोष्ठी में डॉ प्रदीप दुबे सहित अन्य रसिक श्रोता उपस्थित थे।

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